Thursday, 5 June 2014

दिल कह रहा है.......

दिल कह रहा है कि
आज मैं कुछ गुन-गुनाऊँ
गाया था जो कभी मीरा ने
प्रीत-रस में घुला
वही राग मैं गाऊँ
निहार रघुवर को जनक वाटिका में
उठा था जो उल्लास
जनक नंदनी के मन में
उस उल्लास को मैं
गीत में मिलाऊँ .......
दिल कह रहा है कि
आज मैं कुछ गुन-गुनाऊँ
लागे ऐसा कि बरसने को आज
मेघ आए हैं मोरे अंगना
हर बूंद में सुधा है
इस बारिश में मैं आज भीग जाऊँ ......
दिल कह रहा है कि
आज मैं कुछ गुन-गुनाऊँ
प्रीत की रीत से रही मैं
सदा ही अजान
ये भाव भला क्या हैं
कैसे मैं जान पाऊँ ......!
किस-किसको बताऊँ
किससे छुपाऊँ .........!
ये मन मोरा कैसा छलिया है
कभी कहे मैं सबसे बताऊँ
कभी कहे इससे सबसे छुपाऊँ
दिल कह रहा है कि
आज मैं कुछ गुन-गुनाऊँ ......

अंजलि पंडित । 

Friday, 7 December 2012

कितनी ही बार मैंने ज़िंदगी का अक्श

आईने में उतारने की कोशिस की

पर हर बार एक अलग ही

अक्श नजर आया

हर बार मुझे लगा कि बस

अब पहुँच गयी मैं अपने शामियाने में

पर हर बार मैंने अपने को

एक नए मोड पर खड़ा पाया ....... 
आज कितने वर्षों के बाद इस बस्ती में

गुलों का मौसम आया है

आबाद हो गया है फिर से ये वीराना

कि मेरा महबूब आया है

बरसा दो घाटाओं झूम के वो पानी

जो अब तलक मेरी आंखो से

बह-बह के घटा बन रहा था

भीग जाने से शायद कुछ नरमी

आ जाए उसमे .....

वरना तो उसके शख्त मिजाज ने

मुझको बहुत तड़पाया है....




इतराते हैं वो बड़ा इस गुमान पे

कि मरते हैं हम उनके नाम पे

मगर वो इतना भी नहीं जानते

कि ये तो सारा वक्त का सौदा है

आज वो हैं... उस शाख पे तो

कल हम होंगे उस शाख पे

मसलन ये बात तो ठीक है कि

हम उनके दीदार के बिना -

रह नहीं सकते

पर कोई धुन यूं ही नहीं थिरकती

किसी साज पे...

ये वक्त बड़ा जालिम है

इसको बदलते देर नहीं लगती

आज हम नाच रहे हैं जिस ताल पे

कल वो भी नाचेंगे उसी ताल पे...

तिरछी नजरों से चुप-चाप

देख लेते हैं वो .....

सोंचते हैं कि हमको पता नहीं चलता

वो नहीं जानते कि हम फखत

देखने में ऐसे हैं

असल में ऐसे होते तो

अब तक बैठे न होते उन्ही की ताक  में

उन्हे लगता होगा कि ये सब

उनका जादू है .....

जो हम दीवाने बने बैठे हैं

बाँकी यहाँ तो बैठा है एक शिकारी

कबूतर फसने के इंतज़ार में ...........

शातिर होने का हम पे ये जमाने वाले

इल्जाम लगाते हैं....

हम कितने मासूम हैं ये इनको

पता ही नहीं है

कहतें हैं कि हम माहिर हैं

दिले  हुकमत की कला में

पर कैसे आ जाते हैं लोग हमारी रजा में ...

ये हमे पता नहीं है

हम तो निकले थे घर से

खुदा-ए - इबादत के लिए

ये कमबख्त कदम कैसे

आ पहुंचे महफिल में

ये हमे पता नहीं नहीं है....

गैरों कि शिकायत तो हम तब करते

जब अपनों ने  हिमायत कि होती ...

वजह फरमाते भी किसी की वेवफ़ाई की

अगर हमारी किस्मत ने हमसे वफा की -

होती.... 
बड़ी मुद्दतों के बाद आज उसे याद मेरी आई है

रोना तो छोड़ चुके थे हम -

पर ये बेहया आँख जाने क्यों भर आई है ....

भूल आए थे हम वो मोहब्बत की गलियाँ

पाती पिया की आज फिर क्यों आई है....

देखकर खत उनका होने लगी हैं फिर से हसरतें जवां

कि शायद आज भी वो भुला नहीं है मुझे

खत खोलकर देखा तो उसमे लिखा था-

सादर  आमंत्रित हो तुम, परसों मेरी सगाई है

हाय बेरहम इतना दर्द क्या काफी नहीं था

तो आज फिर से तुझे जख्म कुरेदने कि याद आई है...

सोंचा था कि इस खत में होगा -

मेरे इंतज़ार का सिला...मेरे प्यार का बुलावा...

पर ये पाती तो मेरी मौत का सामान लायी है.....

बड़ी मुद्दतों के बाद आज उसे याद मेरी आई है.....