Friday, 7 December 2012

बड़ी मुद्दतों के बाद आज उसे याद मेरी आई है

रोना तो छोड़ चुके थे हम -

पर ये बेहया आँख जाने क्यों भर आई है ....

भूल आए थे हम वो मोहब्बत की गलियाँ

पाती पिया की आज फिर क्यों आई है....

देखकर खत उनका होने लगी हैं फिर से हसरतें जवां

कि शायद आज भी वो भुला नहीं है मुझे

खत खोलकर देखा तो उसमे लिखा था-

सादर  आमंत्रित हो तुम, परसों मेरी सगाई है

हाय बेरहम इतना दर्द क्या काफी नहीं था

तो आज फिर से तुझे जख्म कुरेदने कि याद आई है...

सोंचा था कि इस खत में होगा -

मेरे इंतज़ार का सिला...मेरे प्यार का बुलावा...

पर ये पाती तो मेरी मौत का सामान लायी है.....

बड़ी मुद्दतों के बाद आज उसे याद मेरी आई है..... 

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