Friday, 7 December 2012

इतराते हैं वो बड़ा इस गुमान पे

कि मरते हैं हम उनके नाम पे

मगर वो इतना भी नहीं जानते

कि ये तो सारा वक्त का सौदा है

आज वो हैं... उस शाख पे तो

कल हम होंगे उस शाख पे

मसलन ये बात तो ठीक है कि

हम उनके दीदार के बिना -

रह नहीं सकते

पर कोई धुन यूं ही नहीं थिरकती

किसी साज पे...

ये वक्त बड़ा जालिम है

इसको बदलते देर नहीं लगती

आज हम नाच रहे हैं जिस ताल पे

कल वो भी नाचेंगे उसी ताल पे...

तिरछी नजरों से चुप-चाप

देख लेते हैं वो .....

सोंचते हैं कि हमको पता नहीं चलता

वो नहीं जानते कि हम फखत

देखने में ऐसे हैं

असल में ऐसे होते तो

अब तक बैठे न होते उन्ही की ताक  में

उन्हे लगता होगा कि ये सब

उनका जादू है .....

जो हम दीवाने बने बैठे हैं

बाँकी यहाँ तो बैठा है एक शिकारी

कबूतर फसने के इंतज़ार में ...........

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