मैं मनाऊँ तो तू उलझती है
जिंदगी मुझको क्या समझती है....
हादसों को कोई समझादे की
बिगड़ी तकदीर भी सँवरती है ...
कितनी शैतान हो नदी फिर भी
दो किनारों के बीच बहती है ....
जिंदगी मुझको क्या समझती है....
हादसों को कोई समझादे की
बिगड़ी तकदीर भी सँवरती है ...
कितनी शैतान हो नदी फिर भी
दो किनारों के बीच बहती है ....
Hey Anjali, nice work..
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