Wednesday, 5 December 2012

जिंदगी

मैं मनाऊँ तो तू उलझती है

जिंदगी मुझको क्या समझती है....

हादसों को कोई समझादे की

 बिगड़ी तकदीर भी सँवरती है ...

कितनी शैतान हो नदी फिर भी

दो किनारों के बीच बहती है .... 

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