Wednesday, 5 December 2012

शौके फ़कीरी

हमे तो शौक है फकीरी का क्योंकि

बादशाही की नुमाइस हम देख आए हैं .....

जहां लूटी जाती है शोहबत जिंदगी से

वो रहाइस हम देख आए हैं

कहते थे जो कि सीने मे दरिया है उनके

उन तमंगरों की तंग दिली देख आए हैं

जान देने के दावे करते थे जज़्बे यार वो

जब पूंछी उनसे दर्दे-दिल की दवा

न पूंछों वो कैसे मुस्कुराए हैं

उम्मीद  थी हमे कि सहलाएंगे वो

जख्मे- दर्द को.....

खुदा कसम नहीं देखा आँख उठाकर भी

जब सुना कि हम जख्मे- मरहम

के लिए आए हैं....... 

No comments:

Post a Comment