Friday, 7 December 2012

आज कितने वर्षों के बाद इस बस्ती में

गुलों का मौसम आया है

आबाद हो गया है फिर से ये वीराना

कि मेरा महबूब आया है

बरसा दो घाटाओं झूम के वो पानी

जो अब तलक मेरी आंखो से

बह-बह के घटा बन रहा था

भीग जाने से शायद कुछ नरमी

आ जाए उसमे .....

वरना तो उसके शख्त मिजाज ने

मुझको बहुत तड़पाया है....




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