आज कितने वर्षों के बाद इस बस्ती में
गुलों का मौसम आया है
आबाद हो गया है फिर से ये वीराना
कि मेरा महबूब आया है
बरसा दो घाटाओं झूम के वो पानी
जो अब तलक मेरी आंखो से
बह-बह के घटा बन रहा था
भीग जाने से शायद कुछ नरमी
आ जाए उसमे .....
वरना तो उसके शख्त मिजाज ने
मुझको बहुत तड़पाया है....
गुलों का मौसम आया है
आबाद हो गया है फिर से ये वीराना
कि मेरा महबूब आया है
बरसा दो घाटाओं झूम के वो पानी
जो अब तलक मेरी आंखो से
बह-बह के घटा बन रहा था
भीग जाने से शायद कुछ नरमी
आ जाए उसमे .....
वरना तो उसके शख्त मिजाज ने
मुझको बहुत तड़पाया है....
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